अस्पताल

अस्पताल

क्या अजब जगह है

बिखरी पड़ी है

वेदना दुःख दर्द 

जीवन मृत्यु के प्रश्न

इसी अस्पताल के 

किसी वार्ड के बिस्तर पर

तड़फती रहती है 

जिजीविषा

दवाइयों 

और सिरंज में 

ढूंढती रहती है जीवन

समीप के बिस्तर से 

गुम होती साँसों को देख

सोचती है 

जिजिबिषा 

कल का सूरज 

कैसा होगा …….

पहलू

जीवन की दुर्घटनाओं में अक्‍सर बड़े महत्‍व के नैतिक पहलू छिपे हुए होते है। — प्रेमचन्‍द

पुनर्निमाण

राष्‍ट्र का पुनर्निमाण उसके आदर्शों के पुनर्निमाण के बिना नहीं हो सकता है। — भगिनी निवेदिता

जगजीत सिंह लोकप्रिय गज़ल गायक

जगजीत सिंह  लोकप्रिय गज़ल गायक । संगीत मधुर और आवाज़ संगीत के साथ खूबसूरती से विलय होती ।  ग़ज़लों को आम आदमी तक पहुंचाने का श्रेय अगर किसी को पहले पहल दिया जाना हो तो जगजीत सिंह का ही नाम ज़ुबां पर आता है। उनकी ग़ज़लों ने न सिर्फ़ उर्दू के कम जानकारों के बीच शेरो-शायरी की समझ में इज़ाफ़ा किया बल्कि ग़ालिब, मीर, मजाज़, जोश और फ़िराक़ जैसे शायरों से भी उनका परिचय कराया।  जगजीत जी का जन्म 8 फरवरी 1941 को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था। शुरूआती शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद पढ़ने के लिए जालंधर आ गए। डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया. बचपन मे अपने पिता से संगीत विरासत में मिला। गंगानगर मे ही पंडित छगन लाल शर्मा के सानिध्य में दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखने की शुरूआत की। आगे जाकर सैनिया घराने के उस्ताद जमाल ख़ान साहब से ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियां सीखीं। गजल के बादशाह जगजीत सिंह का 10 अक्‍तूबर 2011 को मुंबई में देहांत हो गया! जगजीत सिंह को श्रध्दांजली !

दशहरा

दशहरा सभी स्‍थानों पर परम्‍परागत और हर्षोल्‍लास के साथ मनाया जाता है । स्‍थान छोटा हो या बड़ा आस्‍था के दर्शन सभी जगहों पर होते है । मेरे कस्‍बे में लगभग 15 वर्षों के बाद रामलीला का मंचन किया गया। सभी ने हर्षोल्‍लास के साथ मंचन में साथ दिया। आज दशहरा पर लोगों में हर्ष व्‍याप्‍त था। कुछ तस्‍वीरें दशहरा आयोजन की 

महानता

अभिप्राय में उदारता कार्य सम्‍पादन में मानवता सफलता में संयम इन्‍ही तीन गुणों से मानव महान बन जाता है। — विस्‍मार्क

विश्‍वास

केवल चरित्रवान व्‍यक्तियों पर ही विश्‍वास किया जाता है। — अल्‍फ्रेड एलडर

वर्गभेद

आप जहां रहते है वहां के लोगों से अपनत्‍व होना स्‍वाभाविक है आप चाहे किसी भी क्षेत्र से क्‍यों न हो। इसी अपनत्‍व में लोग आपसे बहुत कुछ चाहने लगते है। यदि आप नहीं दे पाए तो लोगों का मन कितना काला है ये सामने आ ही जाता है। क्‍या कोई ऐसा नहीं है जो ईमानदारी सरलता का सही मूल्‍यांकन कर सके या सभी वर्गभेद में डूबे हुए है । योग्‍यता का कोई सम्‍मान नहीं रहा है शायद। अन्‍तकरण भीतर तक छलनी हो जाता है यह भेद देख कर । क्‍या सभी कसाई है कि मौका मिला तो मुर्गा मरोड़ ही देगे। हम पीछे की ओर चल रहे या अग्रसर है क्‍या मालुम। फूल बोने पर क्‍या कांटे ही मिलते रहेगे। अब तो हद हो गई है यारब …………..