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एनाकॉन्डा

एनाकॉन्डा कहते ही आंखों के सामने एक विशालकाय सांप की तस्वीर उभर आती है। यह सच है कि एनाकॉन्डा विश्व के सबसे बड़े और खतरनाक सांपों में से एक हैं। कैसे? ठीक बात है भाई, यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए। तो चलिए, चलते हैं दक्षिण अमेरिका के जंगलों में और ढूंढते हैं एनाकॉन्डा को..
लीजिए, पहुंच गए अमेज़ॉन के ज़ंगलों में। अब ढूंढिए एनाकॉन्डा। लेकिन यह इतना आसान नहीं। यह सांप बड़े होते हैं, बहुत ही ज्यादा बड़े लेकिन छुपे रहते हैं। इनसे दोस्ताना व्यवहार की उम्मीद तो नहीं कर रहे थे न आप। जी, ऐसा बिलकुल मत कीजिएगा। मैत्री भाव नहीं रखते यह सांप। एनाकॉन्डा खुद को छुपाने में माहिर होते हैं और पानी या दलीदली इलाके में अपनी खाल के अनुरूप पृष्ठभूमि ढूंढकर छुप जाते हैं। नदियां, झील आदि के पास ही मिलते हैं यह। और जैसे ही खतरा दिखता है, तुरंत पानी में गए और छूमंतर।
वैसे यह सब कहने की बात होगी क्योंकि एक तो क्या खतरा आएगा एक 20 फुट लम्बे और तकरीबन 150 किलो वज़नी सांप पर। और चलो, भूले-भटके आ भी गया कोई हम जैसा इंसानी खतरा, तो यूं तो 20 फुटे जनाब सर्रर्र से सरक नहीं जाएंगे। दिख गए, तो हमें डरने का पूरा मौका देंगे। क्यों, ठीक है न? इतना बड़ा सांप, जो अब तक तो दिख नहीं रहा था, पर अचानक दिखे और वह भी इस तरह सरकता हुआ, तो डर तो लगेगा ही भई।
चलिए, जब तक बाकायदा नहीं दिखते, तब तक थोड़ा परिचय ले लेते हैं श्रीमान एनाकॉन्डा का। ये सांप होते हैं बोआ परिवार के। इसी परिवार में अजगर भी आते हैं। अब समझे, सारे विशालकाय एक ही परिवार में आ जमे हैं।
इनका नाम एनाकॉन्डा क्यों है, क्या मायने होते हैं इसके, यह पूरी तरह से समझ में नहीं आया है। अरे हमें नहीं भाई, वैज्ञानिकों को। इसका मूल एशिया में मिलता दिखाई देता है। कुछ शोध करने वालों ने कहा कि एनाकॉन्डा सिंहली भाषा के किसी शब्द से बना है। तो कुछ का कहना है कि यह तमिल भाषा के शब्द अनाएकोंदरण से बना है, जिसका मतलब होता है हाथी को भी मार गिराने वाला। हूं..यह कुछ ठीक भी लगता है, है न।
वैसे आपको पता है न कि सिंहली भाषा श्रीलंका की आधिकारिक भाषा है। तभी तो कहा कि एनाकॉन्डा नाम का मूल एशिया में मिलता दिखता है।इतना तो ढूंढ लिया, अब तक दिखा नहीं न आपको एनाकॉन्डा? अब क्या अर्जेटीना तक चलें? येलो एनाकॉन्डा कभी-कभी इतने दक्षिण तक भी चले जाते हैं। इनकी बात तो यूं भी अलग है। ये दुनिया के सबसे बड़े सांप होने का गौरव रखते हैं। इनकी लम्बाई होती है 30 फुट और वज़न 227 किलो। बाबा रे!!
लगता है अमेज़ॉन से निराश होकर लौटना पड़ेगा। वैसे दुखी मत होइए, यह सांप वैज्ञानिकों को शोध करने के लिए नहीं मिलता, तो आपको देखने के लिए इतनी आसानी से कैसे मिलेगा। चलते-चलते यह जान लेते हैं कि यह एनाकॉन्डा फिल्म की वजह से मशहूर हुए हैं, या कोई सचमुच खास बात है इनमें।
खास बात यह है कि जैसा कि बताया था एनाकॉन्डा ज़हरीले नहीं होते। पर होते खतरनाक हैं। अपने शिकार को यह शरीर की कुंडली बनाकर उसमें फंसा लेते हैं। फिर कुंडली का शिकंजा तब तक कसते जाते हैं, जब तक कि शिकार दम न तोड़ दे।
ओह, कितना डरवना है यह सब।मादा एनाकॉन्डा अंडे नहीं, संपोलों को जन्म देती है। एक बार में 25-30 छुटके एनाकॉन्डा जन्म लेते हैं। और जन्म के बाद उन्हें किसी ट्रेनिंग की ज़रूरत नहीं होते। ये बेबी, बाबा एनाकॉन्डा भोजन ढूंढने और छुपने आदि के गुर पहले से ही जानते हैं।वैसे कहते हैं बोआ परिवार के सदस्यों के रंग बड़े सुंदर होते हैं।चलिए, इस रंगों वाली बात के साथ वापस चलते हैं। विदा अमेजॉन।

पेड़

एक पेड़ अपने जीवनकाल में लगभग एक टन कार्बन डाईऑक्साइड का अवशोषण कर हमें ऑक्सीजन देता है। अगर घर के आसपास र्प्याप्त संख्या में पेड़ हों, तो आप सिर्फ तरोताजा रहेंगे, बल्कि कमरों के वातानुकूलन पर खर्च होने वाली बिजली के बिल में भी १०१५ फीसदी तक कमी  जायेगी 

मुर्गे के पंख से ईंधन

अमेरीका में भारतीय मूल के प्रोफ़ेसर मनोरंजन मनो मिश्रा मुर्गे के पंख और कॊफी से ईंधन बना कर सुर्खियों में है! उन्हे इस काम के लिये सम्मानित भी किया गया है! श्री मिश्रा को नेवादा सिस्टम आफ हायर एजुकेशन बोर्ड ने वर्श 2010 की रिजेंट्स रिसर्चर उपाधि से सम्मानित किय है! वे नेवादा विश्वविद्यालय के रेनो रिन्युअल एनर्जी सेंटर के निदेशक है! श्री मिश्रा 1998  से संकाय के सदस्य है! वे अब तक पेटेंट के 10 शोधपत्र प्रकाशित कर चुके है! अभी 12 शोधपत्र प्रकाशित करेगे! श्री मिश्रा सौर हाइड्रोजन हाइड्रोजन भंडारण और सेंसर प्रोद्योगिकी में मह्त्वपूर्ण काम कर चुके है!उन्होने पेयजल से आर्सेनिक अवयव को हटा कर प्रसिद्दी पाई है! श्री मिश्रा शोध क्षेत्र में अनेक महत्व पूर्ण कार्य कर रहें है !

हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट

राष्ट्रीय प्रोद्योगिकी संस्थान हमीरपुर हिमचल प्रदेश के विद्यार्थियों ने हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट तैयार किया है! इससे बिजली उत्पन्न की जा सकेगी! संस्थान के तीसरे वर्ष के विद्यार्थी श्याम कुमार सिंह ने अपने सह्पाठियों हिंमाशु, शिप्रा, नवीन, दीपक और भानु के साथ यह प्रोजेकट बनाया है! इसमें पानी ना होने की स्थिति में हाथ से घुमा कर बिजली बनाई जा सकेगी! यह प्रोटोटाईप प्रोजेक्ट है! इससे एक घर की विद्युत आपुर्ति सक्षम हो सकेगी! 16
 पोल जेनरेटर का प्रयोग करते हुए एकल फेस एसी करंट आसानी से तैयार किया जा सकता है! 64  चुम्बकों क प्रयोग पोल के रुप में किया गया है! क्वायल में 200 फेरे तांबे की तार के लगाये गये है जिससे 5  बल्ब जलाये जा सकते है! इन विद्यर्थियों ने इस प्रोजेक्ट को दो सप्ताह में तैयार किया है! फिलहाल इसे हमीरपुर स्थित राष्ट्रीय प्रोद्योगिकी संस्थान के परिसर में प्रदर्शित किया गय है जहां ये बिजली उत्पन्न करके भी दिखा रहे है! संस्थान के इन विद्यार्थियों को बधाई !

ब्लोग्स

जियों जियों समय बितता जा रहा है विज्ञानं निरंतर विकास करता जा रहा है ! अब अपने विचारों को व्यक्त करने का माध्यम ब्लोग्स बनातें जा रहे है लोग बाग़ अपने अपने ब्लोग्स में अपने सुंदर विचार व्यक्त करते जा रहे है ! हर तरफ आम और ख़ास के ब्लॉग है ! अब जरुरत है मात्र समय देने की ! ब्लॉग विचारों के अदान प्रदान का एक सशक्त माध्यम बनता जा रहा है ! गूगल हो या रेडिफ या फिर बिग अड्डा अनेकों द्वार है ब्लॉग बनाने के ! आवश्यकता है की आपकी सोच कितनी सृजनात्मक है! सच हम पेन से की बोर्ड की यात्रा कर रहें है और सफ़र अभी और लम्बा है !

इन्टरनेट

आज सुचना तन्त्र में इतना विकास हो गया है की मनुष्य इन्टरनेट के माध्यम से समीप आ गया है ! अंग्रेजी के अलावा देश की दूसरी भाषाओँ में भी अपने विचार व्यक्त किये जा सकतें है ! आवश्यकता है इमानदारी से प्रयास करने की ! इन्टरनेट के माध्यम से अपने बोधिक स्तर में भी विकास किया जा सकता है ! हिंदी ब्लोग्स में इतना कार्य हो रहा है की वो सब जानकारी हमारी अभिरुचि को निखार सकती है ! जब इतना सब है तो क्या हम हिंदी के उत्थान के लिए दो कदम आगे नहीं बड़ा सकते ?