Category Archives: पर्यटन

श्री खण्‍ड यात्रा की तस्‍वीरें

मेरे मित्र रमेश चौहान गत दिन श्रीखण्‍ड यात्रा पर गए और लौट कर उन्‍होने तस्‍वीरें दी मित्रों के लिए तस्‍वीरें यहां प्रस्‍तुत है

मां भगयाणी मन्दिर हरिपुर धार

ज़िला सिरमौर के हरिपुरधार में स्थित मां भगयाणी मन्दिर समुद्रतल से आठ हज़ार की ऊंचाई पर बनाया गया है! यह मन्दिर उतरी भारत का प्रसिद्ध मन्दिर है! यह मन्दिर कई दशकों से श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र बना हुअ है! वैसे तो यहां वर्ष भर भक्तों का आगमन रहता है परन्तु नवरात्रों और संक्राति में भक्तों की ज्यादा श्रद्धा रहती है! इसका पौराणिक इतिहास श्रीगुल महादेव से की दिल्ली यात्रा से जुडा है जहां तत्कालीन शासक ने उन्हे उनकी दिव्यशक्तियों के कारण चमडे की बेडियों में बांध बन्दी बना लिया था और दर्वार में कार्यरत माता भगयाणी ने श्रीगुल को आज़ाद करने में सहायता की थी! इस कारण श्रीगुल ने माता भगयाणी को अपनी धरम बहन बनाया और हरिपुरधार मेंस्थान प्रदान कर सर्वशक्तिमान का वरदान दिया! आपार प्राकृतिक सुन्दरता के मध्य बना यह मन्दिर आस्था का प्रमुख स्थल है!  बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिये मन्दिर समिति ने ठहरने का प्रबन्ध किया हुआ है! हरिपुरधार  शिमला से वाया सोलन राजगढ एक सौ पचास किलोमीटर दूर है! जबकि चण्डीगढ से १७५ किलोमीटर है! हरिपुरधार के लिये देहरादून से भी यात्रा की जा सकती है!

तानु जुब्‍बड़ मेला 30 मई

                                                                                                       शिमला जिला में नारकंडा ब्लाक के तहत ग्राम पंचायत जरोल में स्थित तानु जुब्बढ़ झील एक सुंदर पर्यटक स्थल है। यहाँ नाग देवता का प्राचीन मन्दिर हैं ! यह झील नारकंडा से 9 किलो मीटर दूर समुद्रतल से 2349 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है ! इस झील का एक पुरातन इतिहास रहा है ! इतनी ऊंचाई पर समतल मैदान के बीचो बीच आधा किलोमीटर के दायरे लबालब पानी से भरी इस झीलं को देख कर हर कोई सोच में पड़ जाता है ! जुब्बढ़ का स्थानीय भाषा में अभिप्राय है घास का मैदान ! इस झील की खोज का श्रेय उन भेड़ बकरी पलकों को जाता है जो यहाँ भेड़ और बकरियों को यहाँ चराने आते थे ! समतल मैदान होने के कारण इन पशु पालकों ने यहाँ पर खेती करने की सोची ! खेती करते समय उन पशु पालकों को यहाँ ठंडे इलाके के बाबजूद सांप नज़र आते थे ! वे उन साँपों को मरने का प्रयास करते तो वो वही पर लुप्त हो जाते थे ! इतना होने पर भी वे पशु पालक वहां पर खेती करते रहे ! एक दिन खेती करते समय एकाएक 18 जोड़ी बैल मैदान के मध्य छिद्र हो जाने से वहा उत्पन हुई जलधारा में समां गए ! इस जलधारा से मैदान पानी से पूरा भर गया ! मान्यता है की इस दृश्य को देखने वाले अभी हैरान परेशां ही थे की वहा नाग देवता जी की प्रतिमा उभर आई ! लोगों ने इसे देव चमत्कार मानते हुए नाग देवता की स्थापना यहाँ कर दी ! आज भी नाग देवता का मंदिर यहाँ पर आलोकिक है और लोगो में बेहद मान्यता है !

उस समय उस चमत्कार में गायब हुए चरवाहे औए बैल सैंज के समीप केपु गाँव में निकले ! यह सब केसे हुआ इसे देव चमत्कार ही माना जाता है !इसके प्रमाण आज भी केपु के मंदिर में देखे जा सकते है !
हर वर्ष यहाँ पर मई मास में 31तारीख के आस पास मेले का आयोजन किया जाता है जो की लगभग तीन दिनों तक चलता है इस मेले में चतुर्मुखी देवता मेलन मेले की शोभा बढाते है ! इस मेले में दूर दूर से श्रद्धालु दर्शनों के लिए आते है ! स्थानीय स्थाई निवासी इस मेले में ज़रूर शिरकत करते है। झील के चारो ओर देवदार के वृक्ष इस स्थल की सुन्दरता को और भी बढ़ा देते है ! ठंडी ठंडी हवा वातावरण को और भी सुहावना बना देती है ! इस मेले में खेल कूद प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाता है जिसमें वोल्ली बाल क्रिकेट इत्यादि प्रतियोगिता प्रमुख है !
कुछ भी कहा जाये परन्तु आज भी पुरातन काल में हुए इन चमत्कारों के प्रमाणों को देख कर लोग चकित रह जाते है ! इस क्षेत्र का प्राकृतिक सोंदर्य अद्भुत तो है ही और पर्यटकों को आकर्षित भी करता है ! आवश्यकता है इस क्षेत्र को और अधिक विकसित करने की क्योंकि यहाँ पर्यटन की आपार संभावनाएं है !

श्रीखंड यात्रा

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला के आनी उपमंडल में 18 हज़ार की ऊंचाई पर स्थित है श्रीखंड महादेव ! श्रीखंड की यात्रा की प्रतीक्षा हर वर्ष की तरह इस बार 16 जुलाई से आरम्भ हो रही है ! यह यात्रा 24 जुलाई तक चलेगी ! पिछले 15 वर्षो से इस यात्रा का सचालन श्री खंड सेवा दल द्वारा किया जा रहा है ! यात्रा जुलाई और अगस्त माह में ही होती है क्योंकि शेष दिनों यहाँ बर्फ पड़ी रहती है ! यात्री शिमला से रामपुर होते हुए यात्रा आरम्भ करते है ! शिमला से रामपुर 130 और रामपुर से बागीपुल 35 किलोमीटर है ! बागीपुल से जांव तक सात किलोमीटर तक वाहन का प्रयोग किया जाता है ! जावं से आगे पैदल यात्रा करनी पड़ती है ! यात्रा के तीन पड़ाव सिंहगाड, थाच्डू और भीमडवार की है जांव से आगे की यात्रा पैदल होती है ! जांव से सिंहगाड 3 किलोमीटर है ! सिंहगाड से 8 किलोमीटर और थाचरू तथा भीमडवार 9 किलोमीटर है ! यात्रा के तीनो पड़ाव में श्रीखंड सेवा दल की तरफ से यात्रियों के लिए दिन रात का लंगर चलाया जाता है ! भीमडवार से श्रीखंड की दुरी मात्र 7 किलोमीटर है ! जांव से श्रीखंड के लिए 18 किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा है ! जिसे यात्री हर हर महादेव के नारों और भजनों के साथ पूरा करते है ! यात्रा के दोरान यात्री कई दर्शनीय स्थलों का दर्शन भी कतरे है जिनमें प्रमुख है प्राकृतिक शिव गुफा देव ढांक , पोराणिक परसु राम मंदिर , दक्षिणेश्वर महादेव व् अम्बिका माता मंदिर निरमंड , संकट मोचन हनुमान मंदिर आरसु, गौर मंदिर जांव, सिंह गाड , ब्राहती नाला , थाचरू जोगनी जोत्काली घाटी, ढँक द्वार , बकासुर वध, कुन्षा , अनेक स्थल है ! यात्रा के दौरान अद्भुत और दुर्लभ जडी बूटियों के दर्शन भी करते हैं ! रास्ता कठिन और संकरा है अक्सर यात्री रास्ता भी भूल जाते है ! यात्रिओं को ग्राम कम्बल टॉर्च लाठी और ग्राम जुराबों सहित टिकाऊ जूतों को लेन की सलाह दी जाती है और अस्वस्थ लोगो को इस यात्रा को नहीं करने दिया जाता क्योंकि रास्ता बेहद ही कठिन है !

बेशक पिछले 15 वर्षों से सेवा दल यात्रा आयोजित कर रहा है परन्तु श्रीखंड महादेव की कैलाश यात्रा अभी तक पर्यटन के मानचित्र पर नहीं आई है !

Buzz It

मणि महेश यात्रा

हिमाचल प्रदेश के चम्बा जिला में स्तिथ मणि महेश यात्रा 13 अगस्त 2009 से शुरू हो रही है ! पवित्र स्नान की तिथियाँ 14 और 27 अगस्त 2009 है ! शिव का निवास मणि महेश धाम अमरनाथ की यात्रा से भी कठिन मानी जाती है ! मणि महेश यात्रा चम्बा के लक्ष्मी नारायण मंदिर से शुरू होती है तथा खुबसूरत पहाडियों और वादिओं से गुजरते हुए मणि महेश के दर्शन होते है ! आस्था है की इस झील में स्नान करने से मनुष्य पाप मुक्त हो जाता है !
मणिमहेश चम्बा जिला के भरमोर में 13500 फुट ऊंचाई पर स्तिथ है ! चम्बा से भरमोर 65 भरमोर से हडसर 14 और हडसर से मणिमहेश झील 13 किलोमीटर है ! रास्ता कठिन तो है मगर प्राकृतिक सौन्दर्य इस कठिनता का आभास नहीं होने देता साथ शिव के दर्शन की लगन इस कठिनाई को दूर कर देती है ! श्रद्धालु जय बम बम भोले का घोष करते हुए इस रस्ते को पूरा करते है तथा अपने जीवन को सफल बनाते है ! रास्ते में पड़ने वाले अन्य पवित्र स्थल गौरी कुण्ड है !

कांगड़ा पठानकोट जोगिंद्रनगर रेल

हिमाचल प्रादेश में कांगडा वैली पठानकोट-जोगिंद्रनगर (केवीआर) रेलवे को यूनेस्को की ओर से वर्ष 2011 में घोषित होने वाली विश्व धरोहर की अस्थायी सूची के लिए नामांकित किया गया है। अंतिम निर्णय स्पेन में होने वाली बैठक में लिया जाएगा। इसका निर्माण 2 मई 1926 को शुरू हुआ। पहली रेलगाड़ी 1 अप्रैल 1929 को पठानकोट रवाना हुई। 163 मील लंबी रेल लाइन 993 पुलों, दो सुरंगों और 484 मोड़ों से होकर गुजरती है। ब्रिटिशकाल में बस्सी परियोजना तक सामान पहुंचाने के लिए यह रेल लाइन बिछाई गई थी। इसके निर्माण पर 2 करोड़ 72 लाख 1300 रुपए खर्च किए गए थे।

ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क

हिमाचल प्रदेश के बंजार घाटी में वर्ष 1984 में बने ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क को धरोहर बनाने की कवायद शुरू हो गई है। इसे लेकर पार्क प्रबंधन ने भारत सरकार को प्रस्ताव भी भेज दिया है। वहीं, केंद्र ने भी इसके लिए सकारात्मक संकेत दिए हैं। 1980 में हिमालय वन्य प्राणी प्रोजेक्ट के तहत व्यासर नदी क्षेत्र में इसका सर्वेक्षण हुआ और 1984 में कुल्लू जिला के बंजार उपमंडल में जीवानाला, सैंज वैली, तीर्थन घाटी के 765 वर्ग किमी क्षेत्र को मिलाकर घाटी के वन्य प्राणी संरक्षण के लिए इसकी स्थापना की गई। अभी पार्क क्षेत्र के 266 वर्ग किमी क्षेत्र में इसका वन्य प्राणी विहार फैला है। पार्क की न्यूनतम उंचाई १५क्क् मीटर

और अधिकतम 6140 मीटर है। यहां पर्वतारोहण के नए रूट खोजे जाने से देशी-विदेशी साहसिक पर्यटकों का आवागमन बढ़ा है। वन्य प्राणियों के संरक्षण, दुर्लभ वनस्पतियों, वन संपदा और पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी बढ़ावा दिया जा रहा है। पार्क क्षेत्र में बर्फानी तेंदुआ, हिमाचली थार, कस्तूरी मृग, ब्राउन बीयर, मोनाल, जाजुराणा समेत लगभग 9 हजार पशु पक्षी विचरण करते हैं। यहां प्राकृतिक व नैसर्गिक सौंदयं का बेजोड़ संगम है।

खूबसूरत नैनीताल

नैनीताल को जिधर से देखा जाए, यह बेहद खूबसूरत है। इसे भारत कालेक डिस्ट्रिक्टकहा जाता है, क्योंकि यह पूरी जगह झीलों से घिरी हुई है। इसकी भौगोलिक विशेषता निराली है। एक बार आने पर ही यह जगह अधिकांश लोगों को अपना दीवाना बना लेती है। 1847 के आसपास नैनीताल मशहूर हिल स्टेशन बना, अंग्रेज तो इसे समर कैपिटल भी कहते थे। यहां झील के आसपास बने शानदार बंगलों और होटलों में रुकने का अपना ही मजा है। अंग्रेजों के जमाने में नैनीताल शिक्षा का भी बड़ा केंद्र बनकर उभरा। अपने बच्चों को बेहतर माहौल में पढ़ाने के लिए अंग्रेजों को यह जगह काफी पसंद आई थी। उन्होंने अपने मनोरंजन के लिए भी व्यापक इंतजाम किए थे। नैनी लेक/स्नो व्यू पर्यटकों के लिए यह सबसे ज्यादा खूबसूरत साइट है। खासतौर से तब जब सूरज की किरणों पूरी झील को अपने आगोश में ले लेती हैं। यह चारों तरफ से सात पहाड़ियों से घिरा हुआ है। यहां बोट राइड और पैडलिंग का भी आनंद उठाया जा सकता है। मुख्य शहर से तकरीबन ढाई किमी दूर बनी इस जगह तक पहुंचने के लिए केबल कार का इस्तेमाल करना पड़ता है। यह सबसे ज्यादा देखे जाने वाले टूरिस्ट स्थलों में से एक है। एक बार घूमने में इसका जादू सिर चढ़कर बोलता है। नैना पीक/चाइना पीक 2611 मीटर की ऊंचाई पर बसी यह चोटी इस जगह का सबसे ज्यादा ऊंचा इलाका है। आपके पास अगर दूरबीन है तो नैना पीक के नजारे आप आसानी से देख सकते हैं। गर्नी हाउस यह अंग्रेज शासक जिम कॉर्बेट का पूर्व निवास स्थल है। नैनीताल चहुंओर पहाड़ियों से घिरा हुआ है, ठीक उसी तरह गर्नी हाउस भी अयारपट्टा पहाड़ियों से घिरा है। यह घर अब एक म्यूजियम की शक्ल ले चुका है और जिम कॉर्बेट की कई यादगार वस्तुएं यहां मौजूद हैं। किलबरी/मुक्तेश्वर अगर आप शांत और सौम्य वातावरण में छुट्टियां गुजारना चाहते हैं तो इसके लिए यह जगह बिल्कुल उपयुक्त है। केबल कार के जरिए यहां पहुंचकर जंगल हाउस में रात गुजारने का अनुभव अलग ही आनंद देता है। यहां ऊपरी चोटी पर शिव मंदिर भी है यानी देशाटन और तीर्थाटन एक साथ।

तानु जुब्बढ़ झील

शिमला जिला में नारकंडा ब्लाक के तहत ग्राम पंचायत जरोल में स्थित तानु जुब्बढ़ झील एक सुंदर पर्यटक स्थल है। यहाँ नाग देवता का प्राचीन मन्दिर हैं ! यह झील नारकंडा से 9 किलो मीटर दूर समुद्रतल से 2349 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है ! इस झील का एक पुरातन इतिहास रहा है ! इतनी ऊंचाई पर समतल मैदान के बीचो बीच आधा किलोमीटर के दायरे लबालब पानी से भरी इस झीलं को देख कर हर कोई सोच में पड़ जाता है ! जुब्बढ़ का स्थानीय भाषा में अभिप्राय है घास का मैदान ! इस झील की खोज का श्रेय उन भेड़ बकरी पलकों को जाता है जो यहाँ भेड़ और बकरियों को यहाँ चराने आते थे ! समतल मैदान होने के कारण इन पशु पालकों ने यहाँ पर खेती करने की सोची ! खेती करते समय उन पशु पालकों को यहाँ ठंडे इलाके के बाबजूद सांप नज़र आते थे ! वे उन साँपों को मरने का प्रयास करते तो वो वही पर लुप्त हो जाते थे ! इतना होने पर भी वे पशु पालक वहां पर खेती करते रहे ! एक दिन खेती करते समय एकाएक 18 जोड़ी बैल मैदान के मध्य छिद्र हो जाने से वहा उत्पन हुई जलधारा में समां गए ! इस जलधारा से मैदान पानी से पूरा भर गया ! मान्यता है की इस दृश्य को देखने वाले अभी हैरान परेशां ही थे की वहा नाग देवता जी की प्रतिमा उभर आई ! लोगों ने इसे देव चमत्कार मानते हुए नाग देवता की स्थापना यहाँ कर दी ! आज भी नाग देवता का मंदिर यहाँ पर आलोकिक है और लोगो में बेहद मान्यता है !
उस समय उस चमत्कार में गायब हुए चरवाहे औए बैल सैंज के समीप केपु गाँव में निकले ! यह सब केसे हुआ इसे देव चमत्कार ही माना जाता है !इसके प्रमाण आज भी केपु के मंदिर में देखे जा सकते है !
हर वर्ष यहाँ पर मई मास में 31तारीख के आस पास मेले का आयोजन किया जाता है जो की लगभग तीन दिनों तक चलता है इस मेले में चतुर्मुखी देवता मेलन मेले की शोभा बढाते है ! इस मेले में दूर दूर से श्रद्धालु दर्शनों के लिए आते है ! स्थानीय स्थाई निवासी इस मेले में ज़रूर शिरकत करते है। झील के चारो ओर देवदार के वृक्ष इस स्थल की सुन्दरता को और भी बढ़ा देते है ! ठंडी ठंडी हवा वातावरण को और भी सुहावना बना देती है ! इस मेले में खेल कूद प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाता है जिसमें वोल्ली बाल क्रिकेट इत्यादि प्रतियोगिता प्रमुख है !
कुछ भी कहा जाये परन्तु आज भी पुरातन काल में हुए इन चमत्कारों के प्रमाणों को देख कर लोग चकित रह जाते है ! इस क्षेत्र का प्राकृतिक सोंदर्य अद्भुत तो है ही और पर्यटकों को आकर्षित भी करता है ! आवश्यकता है इस क्षेत्र को और अधिक विकसित करने की क्योंकि यहाँ पर्यटन की आपार संभावनाएं है !