Category Archives: इतिहास

दशहरा

दशहरा सभी स्‍थानों पर परम्‍परागत और हर्षोल्‍लास के साथ मनाया जाता है । स्‍थान छोटा हो या बड़ा आस्‍था के दर्शन सभी जगहों पर होते है । मेरे कस्‍बे में लगभग 15 वर्षों के बाद रामलीला का मंचन किया गया। सभी ने हर्षोल्‍लास के साथ मंचन में साथ दिया। आज दशहरा पर लोगों में हर्ष व्‍याप्‍त था। कुछ तस्‍वीरें दशहरा आयोजन की 

मां भगयाणी मन्दिर हरिपुर धार

ज़िला सिरमौर के हरिपुरधार में स्थित मां भगयाणी मन्दिर समुद्रतल से आठ हज़ार की ऊंचाई पर बनाया गया है! यह मन्दिर उतरी भारत का प्रसिद्ध मन्दिर है! यह मन्दिर कई दशकों से श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र बना हुअ है! वैसे तो यहां वर्ष भर भक्तों का आगमन रहता है परन्तु नवरात्रों और संक्राति में भक्तों की ज्यादा श्रद्धा रहती है! इसका पौराणिक इतिहास श्रीगुल महादेव से की दिल्ली यात्रा से जुडा है जहां तत्कालीन शासक ने उन्हे उनकी दिव्यशक्तियों के कारण चमडे की बेडियों में बांध बन्दी बना लिया था और दर्वार में कार्यरत माता भगयाणी ने श्रीगुल को आज़ाद करने में सहायता की थी! इस कारण श्रीगुल ने माता भगयाणी को अपनी धरम बहन बनाया और हरिपुरधार मेंस्थान प्रदान कर सर्वशक्तिमान का वरदान दिया! आपार प्राकृतिक सुन्दरता के मध्य बना यह मन्दिर आस्था का प्रमुख स्थल है!  बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिये मन्दिर समिति ने ठहरने का प्रबन्ध किया हुआ है! हरिपुरधार  शिमला से वाया सोलन राजगढ एक सौ पचास किलोमीटर दूर है! जबकि चण्डीगढ से १७५ किलोमीटर है! हरिपुरधार के लिये देहरादून से भी यात्रा की जा सकती है!

आज के दिन 11 जून

1778 रूसी खोजकर्ता गेरासिम इज्माइलोव अलास्का पहुंचा। 1866 देश में इलाहाबाद उच्च न्यायालय, तत्कालीन आगरा उच्च न्यायालय की स्थापना। 1901 न्यूजीलैंड ने कुक द्वीप पर कब्जा किया। 1978 पाकिस्तान के कराची विश्वविद्यालय में अल्ताफ हुसैन ने छात्न राजनीतिक संगठन ऑल पाकिस्तान मुहाजिर स्टूडेंट आर्गेनाइजेशन की स्थापना की। 1981 ईरान के गोलबाफ में आए 6.9 की तीव्रता के भूकंप में लगभग दो हजार लोग मारे गए। 1991 माइक्रो सॉफ्ट ने MS DOS 5.0 जारी किया    

श्रीखण्ड यात्रा 2011

Shrikhand Mahadev

श्रीखण्ड सेवा दल और स्थानीय प्रशासन ने वर्ष 2011 में श्रीखण्ड यात्रा की तिथि की घोषणा कर दी है। सभी शिव भक्तजनों को यह जानकर हार्दिक प्रसन्नता होगी कि हर साल की भांति इस वर्ष भी 16वीं बार श्रीखण्ड महादेव कैलाश यात्रा 15 जुलाई 2011 (श्रावण संक्रांति) से शुरू होने जा रही है और श्रीखण्ड सेवादल के तत्वावधान में यह यात्रा 23 जुलाई 2011 तक चलेगी। इस अवधि में 15 से 22 जुलाई तक श्रीखण्ड सेवादल द्वारा सिंहगाड से प्रतिदिन प्रातः 5 बजे यात्रा के लिए विधिवत जत्था रवाना किया जाएगा। 

यह स्थान समुद्रतल से लगभग 18000 फुट(5155 मीटर) की ऊंचाई पर है जिस कारण यहां मौसम ठण्डा रहता है। अतः यात्रियों से अनुरोध है कि अपने साथ, गर्म कपड़े, कम्बल, छाता, बरसाती व टार्च साथ लाएं। इस यात्रा की पवित्रता को ध्यान में रखते हुए किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थ व प्लास्टिक के लिफाफे साथ न लाएं। यात्रियों से निवेदन है कि पूर्ण रूप से स्वस्थ होने पर ही इस यात्रा में भाग लें। श्रीखण्ड सेवादल कोई सरकारी सहायता प्राप्त संस्था नहीं है, सारा आयोजन सदस्यों के सहयोग से किया जाता है।

आप रामपुर बुशहर (शिमला से 130 किलोमीटर) से 35 किलोमीटर की दूरी पर बागीपुल या अरसू सड़क मार्ग से पहुँच सकते हैं। बागीपुल से 7 किलोमीटर जाँव तक गाड़ी से पहुँचा जा सकता है। जाँव से आगे की यात्रा पैदल होती है। यात्रा के तीन पड़ाव सिंहगाड़ , थाचडू और भीम डवार है। जाँव से सिंहगाड़ तीन किलोमीटर, सिंहगाड़ से थाचडू आठ किलोमीटर की दूरी और थाचडू से भीम डवार नौ किलोमीटर की दूरी पर है। यात्रा के तीनों पड़ाव में श्रीखण्ड सेवादल की ओर से यात्रियों की सेवा में लंगर (निशुल्क भोजन व्यवस्था ) दिन रात चलाया जाता है। भीम डवार से श्रीखण्ड कैलाश दर्शन सात किलोमीटर की दूरी पर है तथा दर्शन उपरांत भीम डवार या थाचडू वापिस आना अनिवार्य होता है।

Shrikhand Mahadev
श्रीखंड महादेव यात्रा के दौरान भक्त जन निरमंड क्षेत्र के कई दर्शनीय स्थलों का भ्रमण भी कर सकते हैं। इस क्षेत्र के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल हैं-

प्राकृतिक शिव गुफा देव ढांक, प्राचीन एवं पौराणिक परशुराम मन्दिर, दक्षिणेश्वर महादेव व अम्बिका माता मन्दिर निरमंड, संकटमोचन हनुमान मन्दिर अरसू, गौरा मन्दिर जाँव, सिंह गाड, ब्राह्टी नाला, थाच्डू, जोगनी जोत, काली घाटी, ढांक डवार, कुनशा, भीम डवार, बकासुर वध, दुर्लभ फूलों की घाटी पार्वती बाग़, माँ पार्वती की तपस्थली नैन सरोवर, महाभारत कालीन विशाल शिलालेख भीम बही।

महिला दिवस

आज अन्‍तरराष्‍ट्रीय महिला दिवस है। सौ वर्षो पुरानी इस परम्‍परा का आरम्‍भ बीसवीं शताब्‍दी में ही हो गया था। 1908 में न्‍यूयार्क सिटी में कामकाजी महिलाओं ने अपनी मांगों को लेकर रैली का आयोजन किया था।  यह प्रयास  महिलाओं को वोट का अधिकार देने के लिए किया गया था।पहला महिला दिवस  मनाने की घोषणा 28 फरवरी 1909 को अमेरिकी समाजवादी पार्टी ने की थी।   इसके बाद इसे फरवरी के अन्तिम रविवार को मनाया जाने लगा। 1910 में कोपेनहेगन के सोशलिस्‍ट इंटरनेशनल के सम्‍मेलन में इसे अंतर्राष्‍ट्रीय दर्जा दिया गया।  1917 मे रूस की महिलाओं ने महिला दिवस पर रोटी कपड़ा के लिए हड़ताल पर जाने का निर्णय लिया । जो एक ऐतिहासिक निर्णय था। ग्रेगेरियन कैंलेण्‍डर के अनुसार यह दिन 8 मार्च का था और इसलिए इस दिन को महिला दिवस के रूप में घोषित किया गया।  संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ ने 1975 को महिला वर्ष घोषित किया था और इस दिवस को आधिकारिक स्‍वीकृति प्रदान की गई थी।

किंकरी देवी की पुण्‍य तिथि

आज 31 दिसम्‍बर है । आज प्रसिद्ध पर्यावरणविद किंकरी देवी की पुण्‍य तिथि है। आज ही के दिन 2007 को उनका स्‍वर्गवास हुआ था। किंकरी देवी ने सिरमौर में  खदान माफिया  के खिलाफ आवाज  उठाई थी । उन्‍हे 2001 में रानी झांसी राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया था। सिरमौर के संगड़ाह में उच्‍च शिक्षा के लिए उन्‍होने 2002 में  आवाज उठाई और संगड़ाह में 2005 में महाविद्यालय स्‍थापित हुआ।

जवाहर लाल नेहरू

आज बाल दिवस है सभी विद्यार्थियों को उज्‍जवल भविष्‍य के लिए अनेकानेक मंगलकामनायें। बाल दिवस जवाहर लाल नेहरू के जन्‍म दिवस के रूप में मनाया जाता है । प्रस्‍तुत है नेहरू जी का जीवन परिचय ।
                           जवाहर लाल नेहरू का जन्म इलाहाबाद में एक धनाढ्य वकील मोतीलाल नेहरू के घर हुआ था। उनकी माँ का नाम स्वरूप रानी नेहरू था। वह मोतीलाल नेहरू के इकलौते पुत्र थे। इनके अलावा मोती लाल नेहरू को तीन पुत्रियां थीं। नेहरू कश्मीरी वंश के सारस्वत ब्राह्मण थे। जवाहरलाल नेहरू ने दुनिया के कुछ बेहतरीन स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो से, और कॉलेज की शि़क्षा ट्रिनिटी कॉलेज, लंदन से पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने अपनी लॉ की डिग्री कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पूरी की। इंग्लैंड में उन्होंने सात साल व्यतीत किए जिसमें वहां के फैबियन समाजवाद और आयरिश राष्ट्रवाद के लिए एक तर्कसंगत दृष्टिकोण विकसित किया। जवाहरलाल नेहरू 1912 में भारत लौटे और वकालत शुरू की। 1916 में उनकी शादी कमला नेहरू से हुई। 1917 में जवाहर लाल नेहरू होम रूल लीग में शामिल हो गए। राजनीति में उनकी असली दीक्षा दो साल बाद 1919 में हुई जब वे महात्मा गांधी के संपर्क में आए। उस समय महात्मा गांधी ने रॉलेट अधिनियम के खिलाफ एक अभियान शुरू किया था। नेहरू, महात्मा गांधी के सक्रिय लेकिन शांतिपूर्ण, सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति खासे आकर्षित हुए। गांधी ने भी युवा जवाहरलाल नेहरू में भारत का भविष्य देखा और उन्हें आगे बढने के लिए प्रेरित किया। नेहरू ने महात्मा गांधी के उपदेशों के अनुसार अपने परिवार को भी ढाल लिया। जवाहरलाल और मोतीलाल नेहरू ने पश्चिमी कपडों और महंगी संपत्ति का त्याग कर दिया। वे अब एक खादी कुर्ता और गाँधी टोपी पहनने लगे। जवाहर लाल नेहरू ने 1920-1922 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया और इस दौरान पहली बार गिरफ्तार किए गए। कुछ महीनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। जवाहरलाल नेहरू 1924 में इलाहाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में दो वर्ष तक सेवा की। यह उनके लिए एक मूल्यवान प्रशासनिक अनुभव था जो उन्हें तब काम आया जब वह देश के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने अपने कार्यकाल का इस्तेमाल सार्वजनिक शिक्षा के विस्तार, स्वास्थ्य की देखभाल और स्वच्छता के लिए किया। 1926 में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से सहयोग की कमी का हवाला देकर इस्तीफा दे दिया.
1926 से 1928 तक, जवाहर लाल ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव के रूप में सेवा की। 1928-29 में, कांग्रेस के वार्षिक सत्र का आयोजन मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में किया गया। उस सत्र में जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस ने पूरी राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग का समर्थन किया, जबकि मोतीलाल नेहरू और अन्य नेताओं ने ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर ही प्रभुत्व सम्पन्न राज्य का दर्जा पाने की मांग का समर्थन किया। मुद्दे को हल करने के लिए, गांधी ने बीच का रास्ता निकाला और कहा कि ब्रिटेन को भारत के राज्य का दर्जा देने के लिए दो साल का समय दिया जाएगा और यदि ऐसा नहीं हुआ तो कांग्रेस पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए एक राष्ट्रीय संघर्ष शुरू करेगी। नेहरू और बोस ने मांग की कि इस समय को कम कर के एक साल कर दिया जाए। ब्रिटिश सरकार ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। दिसम्बर 1929 में, कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में आयोजित किया गया जिसमें जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष चुने गए। इसी सत्र के दौरान एक प्रस्ताव भी पारित किया गया जिसमें भारत की स्वतंत्रता की मांग की गई। 26 जनवरी, 1930 को लाहौर में जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत का झंडा फहराया। गांधी जी ने भी 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया। आंदोलन खासा सफल रहा और इसने ब्रिटिश सरकार को प्रमुख राजनीतिक सुधारों की आवश्यकता को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया ! जब ब्रिटिश सरकार ने भारत अधिनियम 1935 प्रख्यापित किया तब कांग्रेस पार्टी ने चुनाव लड़ने का फैसला किया। नेहरू चुनाव के बाहर रहे लेकिन ज़ोरों के साथ पार्टी के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया। कांग्रेस ने लगभग हर प्रांत में सरकारों का गठन किया और केन्द्रीय असेंबली में सबसे ज्यादा सीटों पर जीत हासिल की। नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए 1936, 1937 और 1946 में चुने गए थे, और राष्ट्रवादी आंदोलन में गांधी के बाद द्वितीय स्थान हासिल किया। उन्हें 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार भी किया गया और 1945 में छोड दिया गया। 1947 में भारत और पाकिस्तान की आजादी के समय उन्होंने अंग्रेजी सरकार के साथ हुई वार्ताओं में महत्वपूर्ण भागीदारी की। 1947 में वे स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। अंग्रेजों ने करीब 500 देशी रियासतों को एक साथ स्वतंत्र किया था और उस वक्त सबसे बडी चुनौती थी उन्हें एक झंडे के नीचे लाना। उन्होंने भारत के पुनर्गठन के रास्ते में उभरी हर चुनौती का समझदारी पूर्वक सामना किया। जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. उन्होंने योजना आयोग का गठन किया, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को प्रोत्साहित किया और तीन लगातार पंचवर्षीय योजनाओं का शुभारंभ किया। उनकी नीतियों के कारण देश में कृषि और उद्योग का एक नया युग शुरु हुआ। नेहरू ने भारत की विदेश नीति के विकास में एक प्रमुख भूमिका निभाई। जवाहर लाल नेहरू ने जोसेफ ब्रॉज टीटो और अब्दुल गमाल नासिर के साथ मिलकर एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद के खात्मे के लिए एक निर्गुट आंदोलन की रचना की। वह कोरियाई युद्ध का अंत करने, स्वेज नहर विवाद सुलझाने, और कांगो समझौते को मूर्तरूप देने जैसे अन्य अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में मध्यस्थ की भूमिका में रहे। पश्चिम बर्लिन, ऑस्ट्रिया, और लाओस के जैसे कई अन्य विस्फोटक मुद्दों के समाधान में पर्दे के पीछे रह कर भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्हें वर्ष 1955 में भारत रत्न से सम्मनित किया गया। लेकिन नेहरू पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के संबंधों में सुधार नहीं कर पाए। पाकिस्तान के साथ एक समझौते तक पहुँचने में कश्मीर मुद्दा और चीन के साथ मित्रता में सीमा विवाद रास्ते के पत्थर साबित हुए। नेहरू ने चीन की तरफ मित्रता का हाथ भी बढाया, लेकिन 1962 में चीन ने धोखे से आक्रमण कर दिया। नेहरू के लिए यह एक बड़ा झटका था और शायद उनकी मौत भी इसी कारण हुई। 27 मई, 1964 को जवाहरलाल नेहरू को दिल का दौरा पडा जिसमें उनकी मृत्यु हो गई.